Reasons Of 1857 Revolt

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Reasons of 1857 revolt In Hindi

प्र०.1857 के विद्रोह के क्या कारण थे? चर्चा कीजिये?

Que.What are the Reasons of 1857 Revolt/War/Revolution?

1857 में उत्तरी व मध्य भारत में एक विशाल जनविद्रोह शुरू हो गया| इसकी शुरुआत तो सिपाहियों के द्वारा की गयी थी परंतु जल्द ही इसे जनता (विशेष रूप से किसानों व तालुकदारों) का भी समर्थन मिलने लगा ये विद्रोह एक वर्ष से अधिक समय तक चलता रहा हालांकि इसमे अंग्रेजो की जीत हुई परंतु क्रांतिकारियों ने कंपनी के शासन का भी भारत से सफाया कर दिया|

इस आंदोलन के कारणों की बात की जाए तो ये आंदोलन किसी एक कारक के कारण शुरू नही हुआ था बल्कि इसे प्रभावित करने वाले अनेक कारक थे इसमे से कुछ कारक निम्नलिखित है:-

आर्थिक कारण(Economic Reasons Of 1857 Revolt)

अंग्रेजो ने देश का आर्थिक शोषण किया एवम देश के संसाधनों का इस्तेमाल केवल अपने हितो को साधने के लिए किया| इन्होंने देश के परंपरागत आर्थिक ढांचे का भी विनाश किया| इन बातो ने बहुत लोगो के मन में अंग्रेजो के खिलाफ घृणा की भावना उत्पन्न की थी| इसमे मुख्य रूप से किसान,जमींदार,ताल्लुकदार,शिल्पकार,दस्तकार व हश्तशिल्प प्रमुख थे क्योंकि यही लोग ज़्यादा निर्धनता के जाल में फंस गए थे| दूसरा ये लोग पहले से ही ब्रिटिश नीतियों के कारण अंग्रेजो से नफरत करते थे| इसी के साथ अंग्रेजो ने भारत में पहले से चल रहे उद्योगो को भी नष्ट कर दिया क्योंकि वो  अपने देश के उद्योग को प्रोत्साहित करना चाहते थे इसी के कारण उन्होंने भारतीय श्रमिको का जी भरकर शोषण किया ताकि वो भारत में ज़्यादा से ज़्यादा धन काम सके एवम इसे अपने देश(ब्रिटेन) भेज सके जिससे की ब्रिटेन की तरक्की हो सके| इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 1813 में एकतरफा व्यापार नीति अपनाई इसके कारण ब्रिटिश व्यापारियों को व्यापार करने की पूरी छूट मिल गयी| जिसका परिणाम ये हुआ की परंपरागत तरीके से बनी भारतीय वस्तुए इनके आगे नही टिक पायी जिसके पीछे एक मुख्य कारण था की ब्रिटिश वस्तुए मशीन निर्मित थी जिसके कारण वो सस्ती होती थी| इसी के साथ भारतीय वस्तुओं पर उच्च कर भी लगाए गए थे इसके कारण 19वी सदी के मध्य तक भारत के सिल्क एवम कपास का निर्यात समाप्त हो चुका था| ब्रिटिश वस्तुओ को गांव गांव तक पहुचने में रेलवे ने भी कंपनी की बहुत मदद की जिसका नतीजा ये हुआ की गाँव में जो लघु उद्योग थे उनका भी धीरे धीरे अंत हो गया था| खेतो के सुधार में कम धन खर्च किया गया था क्योंकि मालगुजारी से प्राप्त आय का इस्तेमाल कंपनी अपने खर्चो को पूरा करने में लगा देती थे| इसी के साथ साथ 1770 से 1857 के बीच 12 बड़े तथा अनेक छोटे अकाल पड़े जिसने की देश की आर्थिक स्थिति को और खराब किया| जमीन के बहुत अधिक लगान के कारण जमीन का मालिकाना हक़ भी किसानों के हाथो से निकलकर व्यापारियों व सूदखोरों के हाथो में जाता रहा क्योंकि ये लोग पहले तो किसानों को कर्ज़ दे देते थे और बाद में यदि किसान कर्ज़ चुकाने में असमर्थ हो जाता था तो या तो उसकी जमीन के मालिक बन जाते थे या उसकी जमीन को नीलाम कर देते थे और अक्सर मालगुजारी की बढ़ती दरो के कारण किसान समय पर अपना कर्ज़ चुका नही पाते थे|

सामाजिक, धार्मिक व अन्य कारण(Social, Religion And Other Reasons of 1857 War/Revolt)

पुराने जमींदारों, अधिकारियों के स्थान पर अब कंपनी द्वारा नए जमींदार, अधिकारी व ताल्लुकदारों की नियुक्ति कर दी गयी ये नए लोग उन पुरानी परम्पराओ से अपरिचित थे जो किसानों व जमीनदारों को एक सूत्र में बांध कर रखती थी| इन नए जमीनदारों ने बस किसानों का शोषण ही किया करो की दरो को बढ़ाकर| निचले स्तर पर प्रशासन में भी भ्रष्ट्राचार फैला हुआ था| पुलिस, छोटे अधिकारी तथा निचली अदालते भ्रष्ट्राचार के मामले में बदनाम ही रही| पुलिस भी जनता को केवल लूटने का ही काम करती थी| न्याय प्रणाली भी काफी पेचीदा थी जिसका फायदा उठाकर उच्च आय समूह के लोग प्रायः निर्धनों को लूटा करते थे| ब्रिटिश अधिकारी भी सिपाहियों से अपमानजनक व्यवहार करते थे और हमेशा उन्हें अपने से नीच ही समझते थे| दूसरी बात ये यही की कोई भी भारतीय सेना में कितना भी अच्छा क्यों न हो वो सूबेदार के पद से ऊपर नही जा सकता था चाहे भले ही वो कितना भी कुशल क्यों न हो एवम महीने के 60 से 70 से अधिक रुपये नही कमा सकता था| अंग्रेज भारत में विदेशी ही बने रहे यहां तक की उन्होंने भारत के उच्च वर्ग के लोगो के साथ भी अपनी सामाजिक मेलजोल नही बढ़ाई| 1856 में कैनिंग ने ये घोषणा भी कर दी की बहादुरशाह की मृत्यु के बाद मुगलो से सम्राट की उपाधि चीन ली जाएगी और अब वो केवल राजा ही कहलायेगे| इसी के साथ लार्ड डलहौजी ने “डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” यानी विलय सिद्धान्त की घोषणा कर दी जिसके द्वारा 1848 में सतारा, 1850 में नागपुर, संबलपुर व बगहट, 1852 में उदयपुर, 1853 में झांसी एवम 1856 में अवध पर भी कब्ज़ा कर लिया| इस सिद्धान्त में ये था कि इसमे दत्तक पुत्रो को उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया गया था|
एक के बाद एक रजवाड़ो के नष्ट होने के कारण रजवाड़ो के प्रशासन में जो लोग थे वो अपनी जीविका का साधन खो बैठे एवम जो लोग सांस्कृतिक गतिविधियों में थे मुख्यत धर्मउपदेशक, पंडित व मौलवी ये लोग भी बर्बाद हो गए| 1856 में चलताऊ बंदोबस्त किया गया जो की जमीन के कब्ज़ादारो या गांव के सहभागियों के साथ सीधा सीधा कर लिया गया इसके कारण अवध में लगभग आधे तालुकदार अपनी जागीर से वंचित हो गए| इसी के साथ कारतूसों पर चर्बी सने कागज़ का खोल चढ़ा होता था और कारतूसों को राइफल में भरने से पहले उनके सिरो को दांतो से काटना पड़ता था और इसमे गाय या सुअर की चर्बी होने की आशंका होती थी जिसके कारण हिन्दू व मुसलमान दोनो ही भड़क उठे उन्हें लगा की इससे उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा| उन्हें ये भय भी था की उनका धर्म संकर में है क्योंकि इसे मिशनरी लोगो को इसाई बनाने में लगे हुए थे एवम हिन्दू व मुसलमान दोनो पर तीखा प्रहार भी करते थे| उन्होंने कुछ लोगो का धर्म परिवर्तन भी किया| 1850 में एक कानून के माध्यम से लोगो का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए प्रोत्साहित भी किया गया था इसमे प्रावधान था की ज धर्म बदलकर ईसाई बनेगा उसे अपनी पैतृक सम्पति में अधिकार मिल जाएगा| इन्होंने सती प्रथा का उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह संबंधी कानून बांये तथा लडकिया के लिए शिक्षा की भी व्यवस्था की ये व्यवस्था लोगो को अनाधिकारी अहस्तक्षेप लगते थे उन्हें लगता था की इससे उनका धर्म नष्ट हो जायेगा| पहले मंदिरो व मस्जिदों से जुड़ी जमीनों को, उनके पुजारियों को एवम सेवा-संस्थाओ को कर देने से मुक्त रखा गया था परंतु अब उन्हें भी कर देना पड़ता था| सिपाहियों द्वारा जाति या पंथ के चिह्नों के उपयोग पर, ढाढ़ी रखने या पगड़ी पहनने पर प्रतिबंध था| 1856 में एक कानून बना जिसमे था की नए भर्ती होने वाले सिपाहियों को जरूरत पड़ने पर समुन्द्र के पर जाकर अपनी सेवा देनी पड़ेगी| उस समय हिन्दू धर्म में समुन्द्र पर जाना पाप माना जाता था और इसके दंड के रूप में व्यक्ति को जाति के बाहर निकाल दिया जाता था|  कुछ बाहरी घटनाए जैसे प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध(1838- 42), पंजाब युद्ध(1845- 49), क्रीमिया युद्ध(1854- 56) इनमे अंग्रेजो को भारी हानि हुई थी इसी से क्रांतिकारियों को प्रेरणा मिली की हम भी अंग्रेजो को हरा सकते है|

तत्कालीन कारण(Temporary Reasons Of 1857 Revolt)

कंपनी ने घोषणा की थी कि सिंध या पंजाब में सेवा करते समय अब सिपाहियों को विदेश सेवा भत्ता नही मिलेगा| आखिरकार किसान भी वर्दीधारी किसान ही थे वो किसानों की दयनीय हालात देख नही पाए और अंत में उन्होंने हथियार उठा लिए| इसी के साथ अफवाह फैली थी की प्लासी के युद्ध(1757) के 100 साल बाद यानी 1857 में देश को आज़ादी मिल जाएगी| इसी के साथ चपाती व कमल के फूल का भारत के अनेक भागो में बँटने लगे थे जो की आने वाले विद्रोह के लक्षण थे|
कलकत्ता के बैरकपुर में मंगल पांडेय नाम के एक सिपाही ने 29 मार्च 1857 को एक यूरोपीय अफसर पर गोली चला दी शीघ्र उन्हें गिरफ्तार करके उनका कोर्ट मार्शल कर दिया गया व अप्रैल में उन्हें फांसी दे दी गयी आखिर 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों ने विद्रोह की शुरुआत कर दी|

इस प्रकार हमने देखा की 1857 के विद्रोह के पीछे कोई एक कारण नही था बल्कि ये अनेक कारणों से प्रभावित थे| ये विद्रोह औपनिवेशिक शासन के चरित्र, उनकी नीतियों के प्रति जनता का आक्रोश और विदेशी शासन के प्रति उनकी घृणा का परिणाम था| 

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